दोस्तों जिंदगी की हकीकत को जितना जल्दी समझ जाएं उतना ही बेह्तर है , ज्यादातर लोग हमेशा इसी ख्याल में जिंदगी निकाल देते है की अगर हमने किसी की लिए कुछ किया है तो वो शायद उनके लिए कुछ करेंगे, पर हकीकत में ऐसा होता नहीं है. ज्यादातर तो नहीं ही होता है, और लोग अक्सर मायूसी का शिकार होते रहते है। 

एक चीज़ का जवाब दीजिये - कोई आपके लिए कुछ क्यूँ करे , सिर्फ इसीलिए की वो आपके दोस्त है या फिर माता पिता या कोई रिश्तेदार हैं।  इन नातों के चलते आपको कोई एक या दो बार तो शायद पूछ भी ले पर उस से ज्यादा की उम्मीद करना आपकी गलतफहमी ही होगी और उस से ज्यादा कुछ नहीं। 



कहीं मैंने एक बार कहा था, कुछ ठीक से याद नहीं - पर वो कुछ ऐसा था:

है कुछ बात इस इंसान में ऐसी की,
अपनों से पहले अक्सर वो अपने की सोचे,
गुनाह तो ये कतई हो नहीं सकता,
पर फितरत ही इन्सान ने ऐसी बना ली की,
कुछ करने से पहले वो खुद की एक बार तो सोचे.

दोस्तों आपको एक बात हमेशा ध्यान रखनी पड़ेगी की आज हम हर किसी चीज़ को कोई मतलब से ही जोड़कर देखते है. यहाँ तक की अगर मै कोई बात आपके फायदे की भी बता दू तो आप एक बार उसमे भी जरूर सोचेंगे की इसमें इसका क्या फायदा होगा की जो ये मेरे फायदे की बात बता रहा है - कुछ तो गड़बड़ है। 

आप तो किसी की भावनाओ को समझते है पर वो दूसरा व्यक्ति कुछ ऐसा ना सोचता हो, वो तो शायद आप को कभी फ़ोन करके पूछे ले या व्हाट्स एप पे मेसज भी छोड़ दे तो अपने आप ये सवाल जरूर करना की इतने दिनों के बाद उसको आपकी याद आ कैसे गयी।  जरूर ही उसको कोई आपसे काम होगा. बिना मतलब के बहुत ही कम लोग आपको याद करते है - चाहे तो इसको अजमा के भी देख सकते है। 

इस चीज़ के शिकार आज कल के युवक बहुत ज्यादा है. उनका एड्रेनेलिन इतनी जोर से रश्के कमर हिलाता है की उन्हें उसके बाद के कमर के झटके के बार में ध्यान ही नहीं रहता, वो तो उसे तब ही आता है जब उसे वो दर्द शुरू होता है. आज कल हम ये जो ब्रेकअप जैसी बाते सुनते है ये कुछ मुरमुरे खाने जैसा हो गया है,आज खाया कल ख़त्म.

आप किसकी भावनाओ की सोच रहे है - जो आपके बारे में कभी सोच ही नहीं रहा था - वो तो आपसे कुछ चाहता था - काम निकल गया बस आप अब उसके लिए एक वास्तु सामान है।  ये बात आपके जॉब, बिज़नस, यारी, नाते, आना जाना सब पे लागु होती है. ये चीज़ इतनी खतरनाक हो गई है की हर आदमी ये सोचने लगा है की मै उसका फयदा कैसे उठाऊ।  आज की राजनीति भी अगर सिर्फ हम लोगो का फायदा उठाने की होगई है तो ये एक दिन में नहीं हो गया. ये एक दिन का किस्सा नहीं हो सकता. मतलबी समाज में आपको वाही मिलता है जो आप होते है.

दोस्तों मै अक्सर नए युवको के लिए कुछ न कुछ करते रहता हूँ।  मेरा येही मानना है की ये सागर में एक बूंद बराबर भी नहीं नहीं पर अगर अपनी इस जिंदगी में कुछ लोगो को भी ढंग की जिंदगी जीने के बारे में बता पाया तो बहुत होगा। 

व्हाट्सप्प एप ग्रुप मे लोगो की लिस्ट बहुत लम्बी है पर वे दोस्त की लिस्ट में नहीं है. दोस्त तो वही है जिसे आप क्या है - अमीर है या गरीब है - इस से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। मै ये भी जानता हु की मै जिनकी कोई मदद करता हु वो कल मुझे शायद पूछे भी नहीं पर इस बात को जितना जल्दी आप समझ जायेंगे उतना ही कम आपको इस का अफसोस होगा। 

मैं आपको अपना ही एक उदाहरण देता हूँ।  मै एक PROFESSIONAL BLOGGER हूँ।  जिसमे मेरी कोशिश यही रहती है की कुछ ना कुछ नया लोगो को बताता रहूँ.  लोगो कोMOTIVATE करना मेरा शौक है जॉब नहीं, और मुझे जानने वालों ने बहुत आग्रह किया की आप अपने गुर लोगो को भी बताये। 

मैंने कहा ठीक है, इसी के चलते मैंने कुछ ऑनलाइन और ऑफलाइन लिखने लगा हूँ।  मैं ये सब फ्री  में लिखता हूँ। 

दोस्तों परखने की शक्ति सूक्ष्म को पहचानना और क्या सही हे उनको गलतियों से अलग करने की क्षमता है । क्या सही है और क्या ग़लत हे ? यह सबसे बुनियादी सवाल हे जो किसी भी छोटा या बड़ा निर्णय लेने के दौरान आता है । जब हम इन दोनों को परख सकेगें, तभी हम जा के निर्णय ले सकते हैं यहाँ तक कि सही तरीका से, सबसे अच्छा तरीका क्या हे वो निर्णय करना ज़रूरी है । यह हमारा मानव जन्म का गहरा प्रतिबिंब है । हम निर्णय कर सकते हें और जीवन को आकार दे सकते हैं । मैडिटेशन करने से हमारे अंदर परखने की शक्ति आ जाती है ।

जब चीजें सामान्य होती हैं तो आम तौर पर लोग आपस में ज्यादा मेल-जोल नहीं बढ़ाते। 

सवाल तभी उठता है जब कोई जीवन में संकट का सामना करता है।

यदि इस समय आपका संबंध उदासीन है, तो मान लें कि आप इस संबंध में जिस मूल्य के लिए पैदा हुए हैं, वह मान्य नहीं है।

ऐसे मामले में, अपने संबंधों की तुलना में करीबी दोस्तों को ढूंढना बेहतर है

रिश्तों में कटुता आने की बहुत सी वजह हो सकती  
हैं:

लोगों का रिश्तों के प्रति संवेदनशील न होना।

लोगों को रिश्तों से ज्यादा अपने कामों को महत्व देना।

एक दूसरे की जरूरत मे साथ न देना।

एक दूसरे के घरों में कम आना जाना।

अपने काम से काम रखना लोगों को रिश्तों मे दूरी बना रहा है।

एक दूसरे के विचारों का न मिलना।

रिश्तों में कटुता का मुख्य कारण है हमारा स्वार्थी स्वभाव

इसी स्वार्थ की वजह से हमारे रिश्तों में कटुता के साथ साथ दरारें भी पढ़ जाती है, स्वार्थ की मुख्य वजह होती है पैसा, प्रॉपर्टी, बटवारा, सुंदरता, भाई भाई का दुष्मन,

दुसरा कारण रिश्तों में कटुता आने का हैं जी ईश्या, जलन। कोई ज्यादा अमीर हो जाए, किसी के बच्चे अच्छे निकल आयें, कोई खुद को भी बेहतर बनाने की बजाय उनसे ईश्या करना शुरू कर देता है, जो किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता,

तीसरा कारण है जी अहम. जिसको प्रभु सब कुछ दे दे, वो उसको संभाल नहीं पता और फालतू घमंड में रहते हुए, कुछ भी किसी को उल्टा सीधा बोल देता है, तीखी और रोबीली वाणी हो जाती है जो रिश्तों में पहले दूरियां बाद में कटुता लाती हैं

दोस्तों रिश्तों में कटुता आने का एक कारण है, घर की औरतें, जो कोई बात हजम नहीं करती बल्कि मसाला लगा कर घर के मर्दों तक पहुंचा देती है, यही एक मुख्य कारण है सयुक्त परिवारों में कटुता आने की। औरतों को चाहिए घर में शांति, सहनशीलता, सौहार्द का वातावरण रखें, जिससे कि हमारे बच्चे भी ऐसी ही बातें सीखे जो आगे जाकर काफी कारागार हो सकेंगी जी

जिन रिश्तों में बातचीत, संवाद की कमी होती है वहां गलतफमियां होने की सम्भावना ज्यादा होती है। लेकिन बातचीत का अर्थ सिर्फ बहस या सही तरीके से लड़ाई नहीं है, आप दोनों जो भी कहते है, करते हैं, जैसे बात करते हैं और आपके शारीरक संकेत भी संवाद का अंश हैं। स्थिति हाथ से निकलने तक इंतज़ार न कर, बात करने और समस्या को सुलझाने का रवैया बहुत कारगार साबित होता है।

ईर्ष्या और अन्य समस्याएं भी उनमें से एक हैं। जब जलन बढ़ कर असुरक्षा का रूप लेले तो आपके साथ आपके पार्टनर को भी परेशान करने लगती है। इसके लक्षण है जब आप किसी से बात करें तो उन्हें बुरा लगने लगे, आपके फोन कि जांच करना या फिर आपकी बातें सुनना और हर वक़्त ध्यान न देने कि शिकायत करना।जलन का समाधान ढूंढ़ना थोडा मुश्किल ज़रूर है, लेकिन कोशिश करनी चाहिए।

हर इंसान के लिए रिश्ते कि बहुत भावनात्मक एहमियत होती है। जब हमें ऐसा लगे कि हमारा साथी हम पर ध्यान नहीं दे रहा तो असंतुष्टि लगभग स्वाभाविक सी हो जाती है। तो जब आपका साथी काम के सिलसिले में आपसे दूर जाये और आपको बिलकुल फोन न करे तो आपको बुरा लग ही जाता है।

यदि आपको लगने लगे कि आपके साथी ने आप पर ध्यान देना कम या बंद कर दिया है तो आप सोचने लगते हैं कि कहीं कुछ गलत हो रहा है। वहीँ दूसरी और यदि कम या किसी और दबाव के चलते आप ये महसूस करते हैं कि आप अपने साथी को पर्याप्त समय या महत्व नहीं दे पा रहे तो आप पर भी एक दबाव सा बनने लगता है।

दोनों ही हालात में, बातचीत करना ही सही उपाय है। अपनी ज़रूरतों और अपेक्षाओं के बारे में खुल कर बात करना किसी भी परिपक्व रिश्ते कि पहली ज़रूरत है। संवाद का आभाव अक्सर एक दूसरे कि ज़रूरतों को समझने में मुश्किलें पैदा करता है। बात करने से मुश्किलों का हल ढूंढ़ना थोडा आसान हो जाता है।

जब  रिश्तों के बीच अपना स्वार्थ आ जाता है तो सही बात भी गलत लगती है ।माँ बाप बच्चों को निस्वार्थ भाव से पालते हैं लेकिन बच्चों के मन में स्वार्थ की भावना आने लगती है ।विशेष कर किसी से प्रेम।उस कुछ दिनों के प्रेम के सामने माँ बाप के 20  साल का प्रेम तुच्छ दिखाई देने लगता है ।क्योंके वहां उनका स्वार्थ आ रहा है ।किसी स्त्री मित्र या पुरुष मित्र का शारीरिक मोह ।उस काम वासना के आगे सारे रिश्ते नाते हीं हो जाते हैं ।कभी कभी पैसों का मोह आ जाता है ।बस सभी जगह यही होता है ।

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