दोस्तों हमें भगवान ने ज़िंदगी दिया है तो उसे हमें अच्छे से जीना चाहिए ।अब सवाल ये उठता है कि अच्छे से ज़िंदगी जिया कैसे जाता है?तो उसका एक आसान सा तरीका है अपने कर्तव्यों का पालन करो । कोशिश करो कि हमारी वजह से किसी को कोई दुख ना पहुंचे ।सबसे सद्व्यवहार करो ।अपनी ज़िंदगी में शांति ,सहानुभूति, शीतलता, सद्गुण आदि को अपने व्यवहार में लाओ। जब जब आपकी जहां जहा जरूरत है वहां जाओ ओर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करो।

Welcome to ज़िंदगी कैसी जीनी चाहिए?

अपने नैतिक कर्तव्य का पालन करो। ओर सबसे बड़ी बात ये ज़िन्दगी जब हम जीते है तो बहुत सारी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जिसकी वजह से कभी कभी इंसान टूट जाता है तो उस समय जो समय की मांग हो वहीं करना चाहिए अन्यथा कभी भी किसी भी बड़ी समस्या में फंस सकते है जिसकी वजह से ज़िन्दगी अयस्त व्यस्त हो सकती है।

किसी मोह माया ना फंसो।रिश्ते संसार में आकर ही बनते है हम पैदा भी अकेले होते है ओर मर कर भी अकेले ही जाना होता है। जब तक ज़िन्दगी रहती है तब तक सब है उसके बाद सब अकेले ही करना है मरने के चार दिन बाद सब सबकुछ भूल जाते है इसलिए सिर्फ ईश्वर पर विश्वास करो उसी से मोह करो वो ज़िन्दगी की नैया पार लगा देगा। हां लेकिन जब तक जीवन है अपने कर्तव्यों का पालन पूरी तरह से करो।

अपने ज्यादा दुश्मन मत बनाओ ।सबसे दोस्ती रखो।जो है जैसा है ओर जो हम कर सकते है वो करो ओर उसमे खुश रहो। जब जीवन मिला है तो कुछ अच्छे काम भी कर लेने चाहिए पता नहीं कब किसकी दुआ काम कर जाए।

ऐसे ही ओर भी बहुत सारे तरीके है जिससे आप अपना जीवन को सर्वोत्तम तरीके से जी सकते है ये तो बस कुछ टिप्स थे ।वैसे तो जितना आप चाहो अच्छे से जी सकते हो लेकिन इतना अच्छा इंसान आजकल कहा बन पाता है इसलिए हमने सिर्फ कुछ ही टिप्स बताए है अगर अपनी रोजमर्रा की लाइफ में इन्हीं का इस्तेमाल कर ले तब भी हमारा जीवन सुखी ओर सर्वोत्तम हो सकता है।

जब हम दुखी होते है या कोई मुसीबत आती है,तब जिन्दगी समझ आती है,खुशी के समय जिन्दगी कैसे गुजर जाती है ,पता ही नहीं चलता है,विकट परिस्थिति में जिंदगी काटे नहीं कटती है। छोटी-छोटी बातों से हम मायूस हो जाते हैं,और जिंदगी नीरस लगने लगती है।

हम मनुष्य में भावनाएं होती है,जिन पर हम जीते हैं।इसका अर्थ यह होता है कि जिंदादिली या मुर्दादिली भावनाओं पर निर्भर है।ये हमारी भावनाएं ही है जो हमारी जिंदगी को खुशियों से भर देती है या मायूस कर देती है।

जिंदगी में सुख- दुःख धूप- छांव की तरह आते जाते है,कोई स्थाई नहीं है,लेकिन हम दुखों से हिम्मत हार जाते है और मायूस हो जाते हैं।बार - बार ये बात मन में उठती है कि जितना दुखी मैं हूं ,उतना कोई नहीं है,सारे जहां का दुख मुझे ही मिला है और जिंदगी बोझ लगने लगती है ,हम दुखों का रोना रोते रहते हैं।जो खुशी जिंदगी में मिली है,उसको हम याद ही नहीं करते है, लेकिन दुःख को जिंदगी भर याद करते हैं।हम ये नहीं सोचते है कि दूसरों के सामने हमसे ज्यादा दुःख और मुसीबत है।

लेकिन हमें जिंदगी से मायूस नहीं होना चाहिए।जिंदगी को जिंदादिली से जीने का प्रयास कर जिंदगी का आनंद लेना चाहिए ,क्योंकि कोई नहीं जानता है कि कल क्या होगा।

जब बचपन से बताई गई चीज़ों के कोई मायने नहीं रहे तब मुझे एहसास हुआ कि सब मोह माया है।

बचपन से मुझे कहा गया कि -

पढ़ाई ही सब कुछ है, पढ़ाई करो और क्लास में अव्वल आओ। बस एक बार 10 वीं अच्छे नंबरों से पास करलो फिर सब सेट है।

इस चक्कर में लोग अपना बचपन खो देते हैं , बाकी चीजों से कोई नाता नहीं रखते। उसके बाद फिर लोग कहते हैं कि अभी तक तुमने जो किया उसके कोई मायने नहीं हैं। असली रेस अब शुरु होगी, बस ये दो साल मेहनत कर लो फिर सब सेट है।

उसके बाद लोग सोचते है घर में कुछ नहीं रखा है बहार जाओ ये बोलते हैं, लोग तो कोटा या अन्य जगह चले जाते है चले जाते हैं ,वहां जाने के बाद पता चलता है कि दुनिया में पढ़ाई के अलावा और भी बहुत सी चीज़े हैं करने को.

दोस्तों अब लोगो को समझाया गया कि जो हो गया सो हो गया, ये सब कुछ मायने नहीं रखता। आने वाले 4 साल तुम्हारी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण 4 साल होंगे। पर तब तक लोग समझ चुके होते हैं कि ये सब मोह माया है।

ये पूरी दुनिया एक सिस्टम में बन्ध चुकी है और जो इस सिस्टम से ऊपर उठ के कुछ सोचता है वहीं असली ज़िंदगी जीता है।

मैं ऐसे बच्चो को भी जानता हूं जो 10 वीं में कम अंक लाके 12 वीं में जिला टॉपर बने हैं। और ऐसों को भी जानता हूं जो 10 वीं तक धुवाधार प्रदर्शन करने के बाद डगमगा गए है।

उनको भी जानता हूं जिन्होंने कॉलेज में 75% उपस्तिथि देके 25–30 हज़ार वाली नौकरी पाई है। और उनको भी जिन्होंने इन सबसे ऊपर उठ के अपना साम्राज्य खड़ा किया है।

सब मोह माया है मेरे दोस्त।

कुछ जीते हैं आने वाले कल में

कुछ जीते है गुज़रे हुए पल में

वर्तमान में जीना होता हैं क्या

लगता भूल ही गए इस जीवन में

तो दोस्तो ज़िंदगी कैसी जीनी चाहिए? नीचे कुछ टिप्स दे रहा हूँ जो शायद आप अपना के जीवन में खुश रह सकते हैं.

* जब तक जियें तब तक सीखते रहें – हमेशा नया कुछ सीखने और पढने में हम जितना समय और ऊर्जा लगाते हैं वह हमारे जीवन को रूपांतरित करता रहता है. हम सभी हमारे ज्ञान का ही प्रतिबिम्ब हैं. जितना अधिक हम ज़िन्दगी से सीखते हैं उतना अधिक हम इसपर नियंत्रण रख पाते हैं.

* अपने शरीर और स्वास्थ्य की रक्षा करें – हमारा शरीर हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यन्त्र या औजार है. हम जो कुछ भी सही-गलत करते हैं उसका हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है. हमें अपने शरीर को पोषण, व्यायाम, और आराम देना चाहिए और स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए.

* प्रियजनों के साथ अधिकाधिक समय व्यतीत करना – हम सभी भावुक प्राणी हैं. हमें सदैव अपने परिजनों और मित्रों के सहारे की ज़रुरत होती है. जितना अधिक हम उनका ध्यान रखते हैं उतना ही अधिक वे हमारी परवाह करते हैं.

* अपने विश्वासों के प्रति समर्पण रखें – कुछ लोग अपने सामजिक परिवेश में सक्रीय होते हैं, कुछ लोग धार्मिक आस्था से सम्बद्ध हो जाते हैं, कोई व्यक्ति लोगों का जीवन सुधरने की दिशा में प्रयास करता है, अधिकांश लोग अपने काम और नौकरी के प्रति समर्पण भाव रखते हैं. प्रत्येक स्थिति में उन्हें एक समान मनोवैज्ञानिक परिणाम मिलता है. वे स्वयं को ऐसी गतिविधि में लिप्त रखते हैं जिससे उन्हें मानसिक शांति और संतुष्टि मिलती है. इससे उनके जीवन को मनोवांछित अर्थ मिलता है.

* जो भी करें सर्वश्रेष्ठ करें – यदि आप कोई काम बेहतर तरीके से नहीं कर सकते तो उसे करने में कोई तुक नहीं है. अपने काम और अपनी अन्य गतिविधियों जैसे रूचियों आदि में सबसे बेहतर साबित होकर निखरें. लोगों में अपनी धाक जमायें कि आप जो कुछ भी करते हैं वह सदैव सर्वश्रेष्ठ ही होता है.

* अपने पैर चादर के भीतर ही रखें – अच्छी ज़िन्दगी जियें लेकिन किसी तरह का अपव्यय न करें. दूसरों को दिखाने के लिए पैसा न उडाएं. याद रखें कि वास्तविक संपत्ति दुनियावी चीज़ों में निहित नहीं होती. अपने धन का नियोजन करें, धन को अपना नियोजन न करने दें. अपने से कम आर्थिक हैसियत रखनेवाले को देखकर जियें.

* संतोषी जीवन जियें – स्वतंत्रता सबसे बड़ा वरदान है. संतोष सबसे बड़ी स्वतंत्रता है.

* अपना प्रेमाश्रय बनायें – घर वहीँ है, ह्रदय है जहाँ. आपका घर कैसा भी हो, उसे प्यार के पलस्तर से बांधे रखें. याद रखें, घर और परिवार एक दुसरे के पूरक हैं.

* स्वयं और दूसरों के प्रति ईमानदार रहें – ईमानदारी भरा जीवन मानसिक शांति की गारंटी है और मानसिक शांति अनमोल होती है.

* दूसरों का आदर करें – बड़ों का आदर करें, छोटों का भी सम्मान करें. ऐसी कोई श्रेणी नहीं होती जो किसी मानव को दूसरे मानव से पृथक कर सकती हो. सभी को एक समान इज्ज़त बख्शें. जितना धैर्य आप अपने नवजात शिशु के प्रति दिखाते हैं उतने ही धैर्य से अपने वृद्ध पिता से भी व्यवहार करें.

* नया करते रहें – अपने प्रियजनों के साथ आप भांति-भांति प्रकार के अनुभव साझा करें. आपकी जीवन गाथा विस्तृत अनुभवों की लड़ी ही तो है! जितने अच्छे अनुभव आप उठाएंगे, आपका जीवन उतना ही अधिक रोचक बनेगा.

* अपने कर्मों की जिम्मेदारी से न बचें – आप कुछ भी करें, भले ही वह सही हो या गलत, उसकी जिम्मेदारी उठाने से न कतराएँ. यदि आप स्वयं जिम्मेदारी ले लेंगे तो आपको जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा.

* अपने वायदों को हद से भी ज्यादा पूरा करें – बहुत सारे लोग दूसरों से बिना सोचविचार किये ही वायदे कर बैठते हैं और उन्हें निभा नहीं पाते. वे वादा करते हैं काम पूरा करने का लेकिन काम शुरू भी नहीं करते. यदि आप लोगों की दृष्टि में ऊंचा उठना चाहते हैं तो इसका ठीक उल्टा करें. अपनी योग्यताओं कों यदि आप कम प्रदर्शित करेंगे तो आप सदैव लोगों की दृष्टि में वांछित से अधिक उपयोगी साबित होंगे. लोगों में आपकी कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल व्यक्ति की छवि बनेगी.

* सुनें ज्यादा, बोलें कम – ज्यादा सुनने और कम बोलने से आप ज्यादा सीखते हैं और आपका ध्यान विषय से कम भटकता है.

* अपना ध्यान कम विषयों पर केन्द्रित करें – कराटे के बारे में सोचें, ब्लैक बैल्ट कम सुन्दर दिखती है बनिस्पत ब्राउन बैल्ट के. लेकिन क्या एक ब्राउन बैल्ट किसी रेड बैल्ट से अधिक सुन्दर दिखती है? बहुत से लोग ऐसा नहीं सोचेंगे. हमारा समाज प्रबुद्ध और महत्वपूर्ण लोगों कों बहुत ऊंची पदवी पर बिठाता है. परिश्रम बहुत मायने रखता है लेकिन इसे केन्द्रित होना चाहिए. अपना ध्यान अनेक विषयों में लगाकर आप किसी एक में पारंगत नहीं हो पायेंगे. एक को साधने का विचार ही सर्वोत्तम है.

* उपलब्ध साधनों का भरपूर दोहन करें –दोस्तों  साधारण व्यक्ति जब किसी बहुत प्रसन्नचित्त दिव्यांग व्यक्ति कों देखते हैं तो उन्हें इसपर आर्श्चय होता है. ऐसी शारीरिक असमर्थता की दशा में भी कोई इतना खुश कैसे रह सकता है!? इसका उत्तर इसमें निहित है कि वे ऐसे व्यक्ति अपने पास उपलब्ध सीमित शक्ति और क्षमता का परिपूर्ण दोहन करने में सक्षम हो जाते हैं. अश्वेत गायक स्टीवी वंडर देख नहीं पाते लेकिन अपनी सुनने और गाने की प्रतिभा को विकसित करने के परिणामस्वरूप उन्होंने 25 ग्रैमी पुरस्कार जीत लिए हैं.

* छोटी-छोटी खुशियों से ज़िन्दगी बनती है – दोस्तों मैं यह हमेशा ही कहता हूँ कि जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह हमें मुफ्त में ही मिल जाता है. वह सब हमारे सामने नन्हे-नन्हे पलों में मामूली खुशियों के रूप में जाने-अनजाने आता रहता है. प्रकृति स्वयं उन क्षणों कों हमारी गोदी में डालती रहती है. अपने प्रियजन के साथ हाथों में हाथ डालकर बैठना और सरोवर में डूब रहे सूर्य के अप्रतिम सौन्दर्य कों देखने में मिलनेवाले आनंद का मुकाबला और कोई बात कर सकती है क्या? ऐसे ही अनेक क्षण देखते-देखते रोज़ आँखों से ओझल हो जाते हैं और हम व्यर्थ की बातों में खुशियों की तलाश करते रहते हैं.

* लक्ष्य पर निगाह लगायें रखें – लक्ष्य की दिशा में न चलने से और भटकाव में पड़ जाने से कब किसका भला हुआ है! आप आज जहाँ हैं और कल आपको जहाँ पहुंचना है इसपर सतत मनन करते रहने से लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है और नई दिशाएं सूझने लगती हैं. इससे आपमें स्वयं कों सम्भालकर पुनः शक्ति जुटाकर नए हौसले के साथ चल देने की प्रेरणा मिलती है.

* अवसरों कों न चूकें – कभी-कभी अवसर अत्प्रश्याशित समय पर हमारा द्वार खटखटाता है. ऐसे में उसे पहचानकर स्वयं कों उसके लिए परिवर्तित कर लेना ही श्रेयस्कर होता है. सभी बदलाव बुरे या भले के लिए ही नहीं होते.

* इसी क्षण में जीना सीखें – जो पल इस समय आपके हाथों में है वही पल आपके पास है. इसी पल में ज़िन्दगी है. इस पल कों जी लें. यह दोबारा लौटकर नहीं आएगा.

तो जिंदगी जीने का कोई नियम नही है किसी को कुछ नही पता कि हम कैसे और कब सफल होंगे । और मज़ेदार बात ये है की सफल होने के बाद आप कुछ भी बकवास बोल दीजिए , ज्यादतर मूर्ख उन्ही को नियम मानकर जीने लग जायंगे। कल को मै किसी फील्ड मे सफल हो गया तो दुनिया वो ही बकवास कहानी सुनेंगी जो मे बताउगा , और लोग उसी को सच मानेंगे। भुलना सीखिए साहब। एक दिन दुनिया भी वही करने वाली है ।

दोस्तों सच कहूं तो ज़िन्दगी रोज़ के हमारे छोटे छोटे अनुभवों में अपना रहस्य बताती रहती है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि आप फुटबाल खेल रहे हैं। सभी को ये लगता है कि फुटबाल में सबसे जरूरी बात है गोल करना। गोल नही करेंगे तो जीत नही पाएंगे। लेकिन ज़िन्दगी आपको इस खेल में समझाना चाहती है कि सबसे जरूरी है उस फुटबाल पर नियंत्रण रखना। छोटे छोटे passes से बॉल को गोलपोस्ट के नज़दीक लेकर जाना। अपनी टीम के खिलाड़ियों पर भरोसा रखते हुए, उनसे passes लेना और passes देना। इधर से उधर दौड़ना। थकान के बारे में ना सोचना। तालमेल बनाते हुए बॉल को गोलपोस्ट के अंदर डालने का प्रयास करते रहना। इस खेल को ईमानदारी से खेलने और जीतने का प्रयास करना। इसमें मिलने वाले हर दर्द तकलीफ को हिम्मत से सहना और गोल हो जाने पर थोड़े से समय के लिए ख़ुशी में जश्न मनाना। फिर नए गोल के लिए उन्ही प्रयासों को दोहराना।

जैसे छोटे-छोटे passes से हम बॉल को गोलपोस्ट के नज़दीक लेकर जाते हैं, ठीक वैसे ही छोटे छोटे लक्ष्यों से हम खुद को ज़िन्दगी के गोलपोस्ट के नज़दीक लेकर जाते हैं। ज़िन्दगी का रहस्य उस गोलपोस्ट में नही छुपा, बल्कि उस गोलपोस्ट तक पहुंचने के लिए हम क्या करते हैं और कैसे करते हैं, इसमें छुपा है।

ज़िन्दगी को हम कैसे जी रहे हैं, इसी बात में ज़िन्दगी का रहस्य छुपा है।

अगर आप ज़िन्दगी को महसूस कर पा रहे हैं। इसकी रफ़्तार को, सुख दुख के लम्हों को, इसकी अनिश्चितताओं को। फिर भी बार बार प्रयास करने का हौंसला रखते हैं। तो आप इस रहस्य को काफी हद तक समझ चुके हैं।

ज़िंदगी और परिस्थितियाँ, एक ही बात तो हैं। बिना परिस्थितियों के ज़िंदगी का मतलब ही क्या हैं? दोनो एक दूसरे के पूरक हैं।

उस ज़िंदगी का मतलब ही क्या जिसमें कुछ उतार चढ़ाव ना हो । ये कुछ वर्षों की ज़िंदगी ऊबन से भर जाएगी, अगर ज़िंदगी में कठिनाइयाँ ना हो, सुख-दुःख ना हो, सब कुछ आसान हो जाए, आसानी से मिलने लगे।

फिर वो ख़ुशी के आँसू और दुःख के आँसू का मर्म क्या?

परिस्थितियों से हार क्या और जीत क्या?

चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हो सिर्फ़ ईमानदारी से अच्छा कर्म करना ज़िंदगी का मक़सद होना चाहिए। ये बातें झूठी नहीं हैं की “हर रात का सवेरा होता हैं”।

आप ख़ुद जानते है कि आप आलसी है … फिर भी अपने आलस को दूर नहीं कर पा रहे .. ये ताज्जुब कि बात है ..

२१ साल के नौजवान हो .. अभी तो ज़िंदगी कि असली भागदौड़ शुरू हुई .. अभी से हार मान जाओगे तो कैसे अपने लक्ष में सफल हो पाओगे …

पहले तो अपने आलस को दूर करें .. उसके लिए सुबह से शाम तक कि दिनचर्या बनाये और नियमित रूप से उसका पालन करे …

रही बात मोटापे कि तो भैया इसके लिए परिश्रम तो करना पड़ेगा … सुबह की सैर करो , खानपान का विशेष ध्यान दो .. इससे आप चुस्त भी रहोगे और फ़ुर्तीले भी …

और जब ये चीज़ें सही ढंग से करोगे तो आप का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा , जिससे आप अपनी परीक्षाओं पर पूरा ध्यान केंद्रित कर पाओगे …

रास्ते ख़ुद ब ख़ुद बनते चले जायेंगे … ज़िंदगी भी सँवर जायेगी .. हमेशा सकारात्मक सोच रखना और कुछ कर गुज़रने कि ज़िद रखना .. हर काम आसान लगने लगेगा !

यहां अपनी मरजी से कहां कुछ चलता है?

सब बंधे हुए हैं रस्मों से, रिवाज़ों से, रिश्तों से, समाज से।

सोचो क्या आप आजादी से जीते है ?यहां आज़ादी से मतलब नियमों से नहीं हैं। आप कुछ भी करने से पहले अपनी मर्ज़ी से पहले पड़ोसी ,रिश्तेदार और लोग क्या कहेंगे ,ये सोचते हैं। फिर कैसी ज़िंदगी? जहां हम अपनी जिंदगी के शादी जैसे निर्णय भी खुद नहीं कर सकते। (यहां मतभेद हो सकते है)।

जैसे अगर कोई प्रेम विवाह करता है ,जाति बंधन के बावजूद तो समाज के लिए उनका नजरिया ही बदल जाता है।

ये तो बहुत बड़ी बात है। आप कितने बजे उठते हैं? अरे यार !कौन अपनी मर्ज़ी से सुबह जल्दी उठना चाहता है? लेकिन उठना पड़ता है न।

बस ये जो करना पड़ता है न, वही…..।।

कहां चाहता है कोई?

आप जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं? ठीक है. तो इसके लिए मैं आपको कुछ छोटी-बड़ी बातें बताऊंगा।  इनमें से आप सबसे पहले उसे करके देखें जो आपको सबसे सरल लगती हो. कुछ वाकई सरल हैं जबकि कुछ को साधने में पूरी उम्र लग सकती है. मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. गेट-सेट-गो!

स्मोकिंग मत कीजिए. स्मोकिंग करना ही चाहते हों तो कहीं से ढेर सारे कैंसरकारक पदार्थ जुटाकर उन्हें चिलम में भरकर उनका धुंआ अपने फेफड़ों में खींच लीजिए और बची हुई राख को चाय-कॉफ़ी में घोलकर पी जाइए। 

मैं मजाक कर रहा था.

कुछ मत कीजिए। 

हो सके तो खाद्य पदार्थों को उस रूप में ग्रहण करने का प्रयास करें जिस रूप में वे प्रकृति में उत्पन्न होते हैं। 

पेड़ में डाल से लगा कोई सेब या संतरा वैसा ही दिखता है जैसा फलों की दुकान में मिलने वाला सेब या संतरा होता है। 

फ़्लेवर और प्रेज़रवेटिव वाला दूध-दही मत लीजिए. प्राकृतिक रूप में मिलने या बनने वाला दूध-दही उपयोग में लीजिए। 

आलू और भुट्टे के चिप्स दिखने में प्राकृतिक नहीं लगते, उन्हें मत खाइए. ऐसी कोई चीज मत खाइए जो नाइट्रोजन भरे हुए उस पॉलीपैक में मिलती है जो भीतर से चांदी जैसा दिखता है।  यह सब खान-पान बस स्वाद का मजा देगा लेकिन सेहत बिगाड़ेगा। 

एक्सरसाइज़, व्यायाम और योग वगैरह महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं लेकिन इन्हें पागलों की तरह करने में कोई तुक नहीं है. मैं ऐसे बहुत से वयोवृद्ध स्वस्थ व्यक्तियों को जानता हूं जो कभी जिम में नहीं गए लेकिन वे खूब चलते-फिरते थे।  अपनी जवानी में वे बाज़ार से झोले भर-भर कर सामान लाते थे. घर से थोड़ा दूर किसी काम से पैदल चलकर जाने में उन्होंने कभी आलस नहीं किया। 

लेकिन मैंने ऐसे भी कई लोग देखे जिन्होंने कभी कोई एक्सरसाइज़ नहीं की, उनके अंतिम दिन बड़े बुरे बीते.

अपना वजन कम रखिए लेकिन इसे लेकर कोई तनाव नहीं पालिए, यदि आपका वजन वांछित से 50 किलो अधिक है तो मानकर चलिए कि यह आपके लंबे जीवन की कामना के आड़े आएगा. इतना अधिक वजन आपको डायबिटीज़, हृदय रोग, कैंसर की चपेट में ले सकता है। 

अधिक वजन का मतलब है बुरी खबर. वांछित से 5 या 10 किलो अधिक वजन भी इनके खतरों को थोड़ा बढ़ा देता है. आपका वजन अपनी ऊंचाई के अनुपात में होना चाहिए। 

लेकिन यदि 10 किलो अतिरिक्त वजन घटाने के प्रयासों से आपको तनाव हो रहा हो तो बेहतर है कि आप मोटे ही बने रहें. तनाव भी आपके लिए बुरी खबर है।  असल में आपको अपने प्रति ईमानदार बने रहना है। यदि बात अतिरिक्त 5 या 10 किलो वजन की ही है तो टेंशन मत लीजिए. लाइफ़स्टाइल में छोटे-छोटे वे बदलाव करें जो आप बिना किसी टेंशन के झेल सकते हों। 

तनाव की बात से याद आया… तनाव कम करें, ये बहुत कठिन काम है। मेरे लिए भी बहुत कठिन है।  मैं बहुत काम करता हूं।  घर का भी, दफ़्तर का भी, बाहर का भी।

ध्यान करें, योग करें, गाना गाएं, कोई वाद्य यंत्र बजाना सीखें, पहाड़ी चढ़ें, घास पर लुढ़कें।  जिसमें आपको आनंद आए वह काम करें। किसी हीरोइन से भी दिल लगा लें लेकिन हेरोइन से दूर रहें। 

दिल लगाने से याद आया… किसी से प्यार करें. डूबकर प्यार करें. आंकड़े बताते हैं कि किसी से प्यार करनेवाले और हैप्पिली मैरिड लोग अकेले रहनेवालों की तुलना में अधिक जीते हैं और अधिक स्वस्थ होते हैं। 

जब आपको लगे कि आपके मन में कोई नकारात्मक विचार आ रहा हो तो कुछ भी ऐसा करें जिससे वह रुक जाए. खुद को ही एक चपत लगाइए।  कोई पॉज़िटिव बात इतनी जोर से चिल्लाकर कहें कि आसपास के लोग अच्छे से सुन सकें।  पॉज़िटिव माइंडसेट में वापस आने के लिए जो कर सकते हों करें। 

जो कुछ भी आप करते हों उसपर मनन करते रहें लेकिन सोचविचार में अति भी न करें. बड़े-बड़े मोटीवेशनल गुरु की बातों में आकर अपने जीवन को सरल-सहज करने पर पिल न पड़ें लेकिन अपनी ज़रूरतें कम रखें।  हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम रखने से शुरु होती है।  अपने जीवन में बड़े बदलाव करने के लिए हड़बड़ी न करें। 

ज़िंदगी में सब कुछ जुटा लेने की होड़ में न पड़ें. मोह में न पड़ें।  खुद को निर्लिप्त बनाने का प्रयास करें, कठिन है. इसे समझाने के लिए एक दूसरा उत्तर लिखना पड़ेगा. गीता पढ़ें. कुछ-कुछ समझ में आ जाएगा। 

लेकिन इस संसार में रूचि बराबर लेते रहें. इससे मुंह न मोड़ें. यह मान लें कि ये दुनिया एक जंगल है और आप एक दुस्साहसी व्यक्ति की तरह इसका अन्वेषण कर रहे हैं। 

छोटी-छोटी अनूठी नित-नवेली बातों को रस लेकर घटित होते देखें. नई चीजें ट्राइ करते रहें. खतरे मोल न लें लेकिन कभी-कभार अपने कम्फ़र्ट जोन से बाहर निकलें। 

बीती ताहि बिसार दें. आगे की सुध लें.

आप अतीत को नहीं बदल सकते. इसके बारे में तभी सोचें जब इससे कोई सबक मिलता हो. आपका वर्तमान ही आपके भविष्य का सृजन करेगा। वह काम करें जो आपको अच्छाई की ओर ले जाए, आपके जीवन को बेहतर दिशा दे। 

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