दोस्तों घर के रिश्ते तो स्वाभाविक ही बनते है लेकिन बाहर के रिश्ते सिर्फ आपसी समझदारी से ही बनते है। लेकिन जब रिश्ते टूटते है तो उसके पीछे बहुत से कारण होते है।  इन सभी कारणों में सबसे बड़ा कारण जो है वो है ग़लतफहमी जिसे अंग्रेजी में मिसअंडरस्टैंडिंग (misunderstanding) कहा जाता है। 


Welcome to गलतफहमी सुविचार


शायद अब समझ रहे होंगे कि इस लेख में क्या कहने का प्रयास किया गया है।  यदि नहीं समझे तो हम आपको आगे बताते है।  आदि युग के समय से ही मानव एक सामाजिक प्राणी रहा है।  भारतीय मूल्यों और संस्कृति के अनुसार मानव जीवन में रिश्तों की बहुत ही बड़ी महत्ता है।  रिश्ता कोई भी हो उसे निभाने की परम्परा हमें अपने इतिहास से भी बखूबी मिलती है।  कभी कभी तो हमारे जीवन में कब रिश्ते बन जाते है जुड़, जाते है, हमे खुद भी पता नहीं चल पाता। रिश्तों नातों को समझाने के लिए न जाने ही लेख लिखे गए, अनेको ग्रंथो की रचना भी हुई। रिश्तों की परिभाषा पर दूरदर्शन और रेडियो पर अनगिनत कार्यक्रम बनाये गए और फिल्म भी बनाये गयी।  इन सब में जो रिश्तों को बनते हुए दिखाया गया तो रिश्तों को बिगड़ते हुए दिखाया गया। 

दोस्तों ग़लतफ़हमियों के कारण रिश्तों में दरार टूटते हुए देर नहीं लगती।  ऐसे में रिश्ते न केवल बिखर जाते है बल्कि उनको फिर से जोड़ पाना लगभग नामुमकीन सा हों जाता है।  जरा सी ग़लतफहमी हुई नहीं की मन मस्तिष्क पर सामने वाले के प्रति नफरत पैदा हो जाती है हम अपना पूरा कीमती समय उसे हानि पहुंचाने में लगा देते है। जो रिश्ता अभी तक सबसे मजबूत माना जा रहा था वह रिश्ता अब अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।  

यह बात ध्यान देने योग्य है कि एक मजबूत रिश्ता जब टूटता तो दर्द दोनों ही पक्षों को होता है। ऐसे में आपका रिश्ता दुबारा जुड़ भी जाये लेकिन उस रिश्ते में पहले जैसा अपनापन नहीं होता।  ये रिश्ता सिर्फ औपचारिकता भर का रह जाता है।  तो रिश्ता न टूटे इसके लिए क्या किया ???रिश्ता न टूटे इसके लिए बिना सोचे समझे कुछ भी कर गुजरने की भावना से बचना चाहिए।  

सारी बातों को, घटनाक्रमों को ध्यान से समझने का प्रयास करना चाहिए। अपने साथ साथ दुसरे की भावनाओं को समझने के लिए भी समय होना चाहिए।  सुनी सुनाई बातों को मानने की बजाय आपसी बातचीत से मुद्दों को सुलझाये। हमारा यहीं प्रयास होना चाहिए कि अपने रिश्तों के बीच में कभी भी ग़लतफहमीयां न आने दें। 


यह शिकायत आपको तकरीबन हर कहीं सुनने को मिल जाएगी, ‘हमें कोई समझता ही नहीं।’ क्या किसी को समझना सचमुच इतना कठिन है, जबकि हम मानते हैं कि हमारे परिवार, हमारे रिश्ते, हमारे नाते, सब आपसी समझ पर ही टिके होते हैं? यह भी सच है कि दूसरों को समझना एक ऐसा कौशल है, जो हर एक के पास नहीं होता। वैसे समझना दोतरफा प्रक्रिया है, लेकिन हमारी आदत एकतरफा प्रक्रिया की होती है। अक्सर हम वही बात समझते हैं, जिसे सुनना पसंद करते हैं। यानी आपसी समझ की कमी का मूल कारण यदि कुछ है, तो वह स्वयं हमारा पूर्वाग्रही और पक्षपाती स्वभाव है। फिर हमारा सोचने का ढंग भी है, जो हमें दूसरों के दृष्टिकोण को सही तरीके से समझने से रोकता है और संबंधों में टकराव पैदा करता है।

समझ और गलतफहमी के बीच में एक बहुत ही पतली रेखा होती है, जिसको भांपने की जरूरत होती है। नासमझी से ज्यादा यह गलतफहमी हानिकारक होती है। एक छोटी-सी गलतफहमी बरसों के बने हुए रिश्तों को कुछ ही क्षण में तबाह कर देती है। 

गलतफहमी हमारे जीवन में आने वाली अनगिनत समस्याओं की शृंखला का एक संकेत है, जिसे समय पर समझना अति आवश्यक है। अत: एक बेहतर दुनिया में बेहतर जीवन जीने के लिए यह अनिवार्य है कि हम बेहतर समझ को धारण करें, ऐसी समझ को, जो हमें गलतफहमियों से बचाए। इसके लिए सबसे पहले हमें सभी से सौहार्दपूर्ण, प्रिय, सुलभ और सरल होना पड़ेगा, ताकि उन्हें हमारे साथ व्यवहार करने में न तो कोई भी तरह का संकोच महसूस हो और न ही इसको लेकर उनके मन में कोई शंका रहे। 

हमारी अंतरात्मा साफ है और अभिव्यक्ति विनम्र और सटीक है, तो फिर किसी भी प्रकार की गलतफहमी के लिए हमारे जीवन में तनिक गुंजाइश भी बाकी नहीं रहेगी। हम बड़ी सहजता से सौहार्दपूर्ण संबंधों को बनाने में कामयाब रहेंगे।

कभी-कभी ऐसी स्थितियां बन जाती हैं जो परेशानियों का कारण बनती हैं। जब भी ये स्थितियां बने, उसी समय यदि हम सावधान हो जाएंगे तो दुखों से बच सकते हैं। यहां जानिए ऐसी बातें, जिनकी वजह से परेशानियां बढ़ती हैं.... जब जीवन साजीवन थी न करें विश्वाससुखी वैवाहिक जीवन के लिए सबसे जरूरी है कि पति और पत्नी, दोनों का एक-दूसरे के प्रति विश्वास अटूट हो। जब भी ये विश्वास टूटता है तो परिवार टूट सकता है। 

इसीलिए हमें प्रयास करना चाहिए कि जीवन साथी का विश्वास ना टूटे। यदि किसी गलतफहमी के कारण ऐसा होता है तो शांति के साथ काम लेना चाहिए और जीवन साथी को सही ढंग से सच्चाई बतानी चाहिए।

अगर तुम गलतफहमी को टालना चाहते हो तो तुम्हें अनिवार्य रूप से मौन सीखना होगा। अगर तुम मौन सीखते हो तो पहली चीज यह होगी कि तुम कभी किसी को गलत नहीं समझोगे। और यह बहुत बड़ा आनंद है -- किसी को भी गलत नहीं समझना! तब तुम अच्छे श्रोता हो गए, तुम सम्यक श्रवण जानोगे। और हर चीज तुम्हारे लिए स्पष्ट और साफ-सुथरी होगी। यह स्पष्टता तर्क से नहीं आएगी, बौद्धिकता से नहीं आएगी, विश्लेषण से नहीं आएगी -- यह स्पष्टता मौन के द्वारा आती है। 

अगर तुम्हारे मौन में किसी के शब्द उतरते हैं तो तुम गलत अर्थ नहीं लगाओगे क्योंकि वहां कोई दखल देने वाला नहीं है; या तो तुम समझते हो या तुम नहीं समझते, लेकिन वहां गलत समझने का कोई कारण नहीं है। मौन सीखो! और कम से कम अपने मित्र के साथ, अपने प्रेमी के साथ, अपने परिवार के साथ, या यहां पर, कभी-कभी मौन में बैठो। गपशप मत करते रहो, बातचीत मत करते रहो। बातचीत बंद करो, और सिर्फ बाहर ही नहीं, भीतरी बातचीत भी बंद करो। अंतराल में बने रहो। बस बैठ जाओ, कुछ नहीं करो, सिर्फ एक-दूसरे के लिए उपस्थित रहो। और जल्दी ही तुम संवाद का एक नया ढंग पा लोगे, और वही सही ढंग है.

गलतफहमियाँ तो होती ही रहती हैं। कुछ छोटी-मोटी होती हैं जिन्हें जल्द ही दूर किया जा सकता है। मगर, कुछ बहुत बड़ी होती हैं जिनसे व्यक्‍ति बुरी तरह परेशान हो जाता है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद भी वे दूर नहीं होतीं। गलतफहमियाँ क्यों होती हैं? गलतफहमी के शिकार लोगों पर इसका क्या असर होता है? जब दूसरों को आपके बारे में गलतफहमी हो जाती है, तब आप क्या कर सकते हैं? और क्या यह वाकई अहमियत रखता है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं

गलतफहमियाँ तो होती ही रहती हैं। कुछ छोटी-मोटी होती हैं जिन्हें जल्द ही दूर किया जा सकता है। मगर, कुछ बहुत बड़ी होती हैं जिनसे व्यक्‍ति बुरी तरह परेशान हो जाता है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद भी वे दूर नहीं होतीं। गलतफहमियाँ क्यों होती हैं? गलतफहमी के शिकार लोगों पर इसका क्या असर होता है? जब दूसरों को आपके बारे में गलतफहमी हो जाती है, तब आप क्या कर सकते हैं? और क्या यह वाकई अहमियत रखता है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं?

एक कड़वा सच

लोग हमारे दिल की बातों या इरादों को जान नहीं सकते, इस वजह से देर-सबेर कोई-न-कोई तो हमारी कथनी या करनी का गलत मतलब निकालेगा ही। इसी वजह से कई बार गलतफहमियाँ हो जाती हैं। कभी-कभी हम अपनी बातों और विचारों को अच्छी तरह से और साफ-साफ शब्दों में कह नहीं पाते। कभी-कभी आस-पास में हो रही आवाज़ों और दूसरे विकर्षणों की वजह से शायद सामनेवाला व्यक्‍ति हमारी बातें ठीक तरह से सुन न पाए जिसकी वजह से भी गलतफहमी हो जाती है।

कुछ लोग अपने स्वभाव और तौर-तरीकों की वजह से गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। मसलन, अगर कोई व्यक्‍ति शर्मीला हो, तो उसके बारे में यह गलत राय कायम की जा सकती है कि वह ठंडे किस्म का, सबसे अलग रहनेवाला या घमंडी इंसान है। इसके अलावा, ज़िंदगी में पहले हुए अनुभवों की वजह से भी लोग उसी तरह के हालात का फिर से सामना करने पर हद-से-ज़्यादा प्रतिक्रिया दिखाते हैं, इससे भी गलतफहमी पैदा हो सकती है। अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं की वजह से भी कभी-कभी लोग, किसी बात का कुछ और ही मतलब निकाल सकते हैं। इतना ही नहीं, गपशप और मिर्च-मसाला लगाकर कही गयी बातों की वजह से भी गलतफहमियाँ पैदा हो जाती हैं। इसलिए उस समय हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए जब शुरू में कही गयी बात या किए गए काम का कुछ और मतलब निकालकर हमें बताया जाता है। लेकिन यह सच है कि जो गलतफहमी के शिकार हुए हैं, उन्हें यहाँ बताए गए गलतफहमी के कारणों से ज़्यादा तसल्ली नहीं मिलेगी।

दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं, यह खासकर इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस हद तक आपके इरादों को समझ पाए हैं। सो, जब लोग आपके नेक इरादों का गलत मतलब निकालते हैं तो वाजिब है कि इससे आपको बुरा लगता है। आप शायद बहुत नाराज़ हो जाएँ और सोचें कि आखिर क्यों किसी को आपकी बात का गलत मतलब निकालना चाहिए। आपकी नज़रों में ऐसा सिर्फ आपका अपमान करने के इरादे से किया गया है, आपको उनकी राय बिलकुल एक-तरफा, यहाँ तक कि पूरी तरह से गलत लगती है। और इससे दिल को ठेस पहुँच सकती है, खासकर अगर आप दूसरों की अनुचित राय को बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं।

दूसरे जब आपके बारे में इस तरह की अनुचित राय कायम करते हैं, तो आप शायद खीझ उठें, मगर फिर भी दूसरों की राय का आदर करना उचित है। दूसरे हमारे बारे में जो राय रखते हैं, उसे तुच्छ जानना मसीही व्यवहार नहीं है। और ना ही हम कभी चाहते हैं कि हमारी बातों और कामों से दूसरों को कोई हानि हो। सो, अगर किसी ने आपके बारे में गलत राय कायम कर ली है तो कभी-कभी आपको शायद उसकी गलतफहमी दूर करने की कोशिश करनी पड़े। मगर, हर बात में दूसरों की स्वीकृति पाने की हद-से-ज़्यादा चिंता करने से खुद को ही नुकसान पहुँचता है। हमारा आत्म-सम्मान घटता है, यहाँ तक कि लोग हमें ठुकराने भी लगते हैं। हकीकत तो यह है कि आपकी असली अहमियत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं।

दूसरी तरफ, आपको शायद यह लगे कि आपके बारे में जो निंदा की गयी, वह सही है। यह जानकर भी आपको तकलीफ हो सकती है। लेकिन, अगर आप खुशी-खुशी और पूरी ईमानदारी से अपनी कमज़ोरियों और असिद्धताओं को कबूल करेंगे, तो ऐसी बातों से आपको फायदा ही होगा। कैसे? आप अपने बारे में कायम की गयी राय से सीख सकते हैं और अपने आप में ज़रूरी बदलाव कर सकते हैं।रिश्ते निभाते समय हम कई बार गलतफहमी का शिकार हो जाते है, कोई हमारा भला ही चाहता है,
हमारे भलाई के लिए ही उसका हमारे प्रति व्यवहार कड़क या हमारे लिए कष्ट दायक रहता है, लेकिन...
उस कष्ट में हमारा हित ही छुपा होता है.....

हमें कष्ट होते ही, मन में कई विचार आने लगते है, हमें लगने लगता है की, ये मेरा बुरा करना चाहता है,
उसके प्रति मन में बैर जागता है... वास्तविक में वो हमारा हितैषी होता है और हम उसे अपना शत्रु बना लेते है,
जब तक हमें समज आती है तब तक बहोत देर हो जाती है, हम अपना एक सच्चा हितैषी खो चुके होते है,

दोस्तों जँहा मित्रता हो वँहा संदेह न हो, आओ कुछ ऐसे रिश्ते बनाये......कुछ हमसे सीखें.... कुछ हमे सिखाएं.

गलतफहमी को दूर न करने से हम सामने वाले व्यक्ति से दूर होते चले जाते हैं और उसके प्रति नई-नई गलतफहमियाँ पालते जाते हैं. इसलिए अच्छा यही होता है कि गलतफहमी को जल्दी हीं दूर कर लिया जाए.

गलतफहमियों के अंजाम शायद बहुत गंभीर भी हो सकते हैं और नहीं भी। मान लीजिए कि आप एक होटल में किसी व्यक्‍ति को बहुत ऊँची आवाज़ में बातें करते हुए सुनते हैं, तो आप शायद यह निष्कर्ष निकालें कि वह दिखावा कर रहा है और दूसरों का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहता है। आप गलत भी हो सकते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस व्यक्‍ति से वह बात कर रहा है वह बहुत ऊँचा सुनता हो? उसी तरह, किसी स्टोर में काम करनेवाली महिला के व्यवहार से आपको लगे कि वह बहुत ही रूखे किस्म की इंसान है। मगर ऐसा भी हो तो सकता है कि उसकी तबियत शायद ठीक न हो और इसलिए वह ऐसा व्यवहार कर रही हो। हालाँकि इस तरह की गलतफहमियों की वजह से किसी के बारे में गलत राय कायम कर ली जाती है, मगर इनका अंजाम अकसर गंभीर नहीं होता, ना ही इसका प्रभाव काफी समय तक रहता है। मगर, कभी-कभी गलतफहमियों की वजह से तबाही मच जाती है।

क्या आपके बारे में गलत राय कायम की गयी है?

गलतफहमियाँ तो होती ही रहती हैं। कुछ छोटी-मोटी होती हैं जिन्हें जल्द ही दूर किया जा सकता है। मगर, कुछ बहुत बड़ी होती हैं जिनसे व्यक्‍ति बुरी तरह परेशान हो जाता है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद भी वे दूर नहीं होतीं। गलतफहमियाँ क्यों होती हैं? गलतफहमी के शिकार लोगों पर इसका क्या असर होता है? जब दूसरों को आपके बारे में गलतफहमी हो जाती है, तब आप क्या कर सकते हैं? और क्या यह वाकई अहमियत रखता है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं?

अगर कोई व्यक्‍ति शर्मीला हो, तो उसके बारे में यह गलत राय कायम की जा सकती है कि वह ठंडे किस्म का, सबसे अलग रहनेवाला या घमंडी इंसान है। इसके अलावा, ज़िंदगी में पहले हुए अनुभवों की वजह से भी लोग उसी तरह के हालात का फिर से सामना करने पर हद-से-ज़्यादा प्रतिक्रिया दिखाते हैं, इससे भी गलतफहमी पैदा हो सकती है। अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं की वजह से भी कभी-कभी लोग, किसी बात का कुछ और ही मतलब निकाल सकते हैं। इतना ही नहीं, गपशप और मिर्च-मसाला लगाकर कही गयी बातों की वजह से भी गलतफहमियाँ पैदा हो जाती हैं। इसलिए उस समय हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए जब शुरू में कही गयी बात या किए गए काम का कुछ और मतलब निकालकर हमें बताया जाता है। लेकिन यह सच है कि जो गलतफहमी के शिकार हुए हैं, उन्हें यहाँ बताए गए गलतफहमी के कारणों से ज़्यादा तसल्ली नहीं मिलेगी।

आना की मिसाल लीजिए। उसने बड़े भोलेपन में एक सहेली की गैर-मौजूदगी में उसके बारे में यह कहा कि सभी लोग उसे कितना पसंद करते हैं। उसकी इस बात को घुमा-फिराकर दूसरों को बताया गया। फिर एक दिन, आना की उस सहेली ने चार लोगों के सामने बड़े गुस्से में आना पर यह इलज़ाम लगाया कि तुम मुझसे बहुत जलती हो क्योंकि फलाना युवक मुझ पर ज़्यादा मेहरबान है। उसके इस इलज़ाम से आना को बहुत ताज्जुब हुआ और दुःख भी। क्योंकि आना की बातों का पूरी तरह से गलत मतलब निकाला गया था। आना ने अपनी सहेली को यह समझाने की बहुत कोशिश की कि उसका इरादा नेक था और वह अपनी सहेली का बिलकुल भी बुरा नहीं चाहती थी। मगर उसकी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। और इससे आना के दिल को बहुत ठेस पहुँची और उस गलतफहमी को पूरी तरह दूर करने में आना को काफी समय लगा।

दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं, यह खासकर इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस हद तक आपके इरादों को समझ पाए हैं। सो, जब लोग आपके नेक इरादों का गलत मतलब निकालते हैं तो वाजिब है कि इससे आपको बुरा लगता है। आप शायद बहुत नाराज़ हो जाएँ और सोचें कि आखिर क्यों किसी को आपकी बात का गलत मतलब निकालना चाहिए। आपकी नज़रों में ऐसा सिर्फ आपका अपमान करने के इरादे से किया गया है, आपको उनकी राय बिलकुल एक-तरफा, यहाँ तक कि पूरी तरह से गलत लगती है। और इससे दिल को ठेस पहुँच सकती है, खासकर अगर आप दूसरों की अनुचित राय को बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं।

दूसरे जब आपके बारे में इस तरह की अनुचित राय कायम करते हैं, तो आप शायद खीझ उठें, मगर फिर भी दूसरों की राय का आदर करना उचित है। दूसरे हमारे बारे में जो राय रखते हैं, उसे तुच्छ जानना मसीही व्यवहार नहीं है। और ना ही हम कभी चाहते हैं कि हमारी बातों और कामों से दूसरों को कोई हानि हो। सो, अगर किसी ने आपके बारे में गलत राय कायम कर ली है तो कभी-कभी आपको शायद उसकी गलतफहमी दूर करने की कोशिश करनी पड़े। मगर, हर बात में दूसरों की स्वीकृति पाने की हद-से-ज़्यादा चिंता करने से खुद को ही नुकसान पहुँचता है। हमारा आत्म-सम्मान घटता है, यहाँ तक कि लोग हमें ठुकराने भी लगते हैं। हकीकत तो यह है कि आपकी असली अहमियत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं।

दूसरी तरफ, आपको शायद यह लगे कि आपके बारे में जो निंदा की गयी, वह सही है। यह जानकर भी आपको तकलीफ हो सकती है। लेकिन, अगर आप खुशी-खुशी और पूरी ईमानदारी से अपनी कमज़ोरियों और  असिद्धताओं को कबूल करेंगे, तो ऐसी बातों से आपको फायदा ही होगा। कैसे? आप अपने बारे में कायम की गयी राय से सीख सकते हैं और अपने आप में ज़रूरी बदलाव कर सकते हैं।

बुरे अंजाम

गलतफहमियों के अंजाम शायद बहुत गंभीर भी हो सकते हैं और नहीं भी। मान लीजिए कि आप एक होटल में किसी व्यक्‍ति को बहुत ऊँची आवाज़ में बातें करते हुए सुनते हैं, तो आप शायद यह निष्कर्ष निकालें कि वह दिखावा कर रहा है और दूसरों का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहता है। आप गलत भी हो सकते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस व्यक्‍ति से वह बात कर रहा है वह बहुत ऊँचा सुनता हो? उसी तरह, किसी स्टोर में काम करनेवाली महिला के व्यवहार से आपको लगे कि वह बहुत ही रूखे किस्म की इंसान है। मगर ऐसा भी हो तो सकता है कि उसकी तबियत शायद ठीक न हो और इसलिए वह ऐसा व्यवहार कर रही हो। हालाँकि इस तरह की गलतफहमियों की वजह से किसी के बारे में गलत राय कायम कर ली जाती है, मगर इनका अंजाम अकसर गंभीर नहीं होता, ना ही इसका प्रभाव काफी समय तक रहता है।

मामले को प्यार से सुलझाइए

यह तो साफ पता चलता है कि मामले को स्पष्ट कर लेने में ही बुद्धिमानी है। अभी हमने जिस दूसरी घटना की बात कि उसमें कौन जाने कितनी जानें बच गयीं, बस इसीलिए कि दोनों पक्ष के लोगों ने कुछ कर गुज़रने से पहले आपस में बात की? ये तो सच है कि ज़्यादातर मामलों में, अगर आप किसी के नेक इरादों का गलत मतलब निकाल बैठते हैं, तो उसमें किसी की ज़िंदगी दाँव पर नहीं होती, मगर दोस्ती दाँव पर ज़रूर हो सकती है। सो अगर आपको लगता है कि किसी ने आपके बारे में कुछ गलत बात कह दी है, तो क्या आपको पूरा यकीन है कि जो उस वक्‍त कहा गया था, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं या आपसे ही समझने में कोई गलती हो रही है? उस व्यक्‍ति के इरादे क्या थे? उसी से पूछिए। क्या आपको लगता है कि आपके बारे में गलत राय कायम की जा रही है? इस बारे में उससे बात कीजिए। अपने अहं को आड़े आने मत दीजिए।
गलतफहमी तुरंत दूर करें
आजकल रिश्तों के बीच कई कारणों से दरार आने लगी है। उनमें से एक कारण है गलतफहमी। गलतफहमी में आकर हम कभी-कभी बहुत बड़ी गलती कर बैठते हैं और इसी के चलते रिश्तों में मनमुटाव के कीटाणु पनपने लगते हैं ।

गलतफहमी पैदा होने के कई माध्यम होते हैं। कभी-कभी किसी कारणवश हम एक-दूसरे के प्रति गलत धारणा बना लेते हैं और संबंधों में दरार उत्पन्न कर लेते हैं। दो लोगों की गहरी दोस्ती देखकर कई बार तीसरा इंसान उनके बीच गलतफहमी पैदा करके उन्हें अलग करने की कोशिश करने लगता है।

सो, अगर आपको किसी से कोई शिकायत है, तो उचित होगा कि आप जाकर उस व्यक्‍ति से अकेले में बात करें और दूसरों को इसमें शामिल न करें। जिसने आपको नाराज़ किया है, अगर वह इस बारे में आपके बजाय किसी और के मुँह से पहले सुन लेता है, तो बनती बात बिगड़ भी सकती है।आपका मकसद होना चाहिए प्यार से मेल-मिलाप या सुलह करना। एकदम शांति से, साफ-साफ, सरल शब्दों में और बिना इलज़ाम लगाते हुए अपनी समस्या बताइए। समझाइए कि इस वजह से आपके दिल पर क्या गुज़र रही है। फिर खुले विचारों से उसकी बातों को ध्यान से सुनिए। जल्दबाज़ी में यह मत सोच लीजिए कि उसके इरादे नेक नहीं थे। इतना भरोसा करने के लिए तैयार रहिए कि सामनेवाले व्यक्‍ति का इरादा नेक ही था। याद रखिए कि प्रेम “सब बातों पर विश्‍वास करता

माना कि गलतफहमियों को दूर करने के बावजूद भी, दिल पर लगा ज़ख्म जल्दी नहीं भरता, या उसके बुरे अंजाम तो भुगतने ही पड़ते हैं। ऐसे में क्या किया जा सकता है? अगर ज़रूरत पड़े तो, दिल से माफी माँगना बिलकुल ठीक रहेगा, साथ ही मामले को ठीक करने के लिए अगर कुछ किया जा सकता है, तो उसे करना भी ज़रूरी है। ऐसी हर स्थिति में, गलतफहमी का शिकार व्यक्‍ति अगर बाइबल की इस सलाह को मानता है तो उसे फायदा होगा: जब तक हम असिद्ध रहेंगे, तब तक हमारे बीच गलतफहमियाँ होती रहेंगी और लोगों को ठेस पहुँचती रहेगी। किसी से भी गलती हो सकती है या कोई भी ऐसे लहज़े से बात कर सकता है जो सुननेवाले को कठोर या बुरा लग सकता है। बाइबल बताती है: “अपने मन में उतावली से क्रोधित न हो, क्योंकि क्रोध मूर्खों ही के हृदय में रहता है। 

किसी ने आपके बारे में गलत राय कायम कर ली है, और उसे दूर करना नामुमकिन लग रहा हो, तब आप क्या कर सकते हैं? हार मत मानिए। जितना हो सके, उतना आप मसीही गुणों को अपने अंदर बढ़ाने और अमल में लाने की कोशिश करते रहिए। जहाँ सुधार की ज़रूरत है, वहाँ सुधार करने के लिए यहोवा से मदद माँगिए। दरअसल, आपकी असली अहमियत तो इंसानों द्वारा नहीं आँकी जा सकती।

कोई हमारे बारे में गलत राय कायम कर ले, यह जानना हमें कभी-भी अच्छा नहीं लगता। लेकिन, अगर मामले को सुलझाने के लिए आप अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं और प्रेम और क्षमा के बाइबल के उसूलों को अमल में लाते हैं, तो मुमकिन है कि आपको भी इसके मीठे फल ही मिलेंगे।

एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या के बीज बोने वाले लोगों की कमी इस दुनिया में नहीं है। गलतफहमी के चलते ही हम कई बार सच्चे मित्र या हितैषी को खो देते हैं। असल में ऐसी किसी भी गलतफहमी को एक-दूसरे से आपस में खुलकर बात करके दूर कर लेना चाहिए।

किसी भी विषय को लेकर हमें अगर किसी से, किसी भी तरह की गलतफहमी हो गई हो तो उसे जल्द से जल्द दूर कर लेना चाहिए, क्योंकि गलतफहमी भी एक धीमा जहर है, जिससे इंसान मन ही मन घुटता रहता है और तनाव में आ जाता है। यह तनाव इंसान को भीतर ही भीतर खोखला करता रहता है। हमें चाहिए कि हम अपनी गलतफहमी दूर कर लें और मन को रखें प्रफुल्लित और खुश।

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