जीवन में सफलता का रहस्य है आत्मविश्वास

दोस्तों मनुष्य कितनी भी मेहनत कर ले, परंतु उसे अपने पर भरोसा नहीं है तो वह सफल नहीं हो सकता। अपने पर जिसे विश्वास रहता है उसे अंदर से ही अलौकिक शक्ति का बल मिलता है। जन्म से ही कोई महान अथवा गुणवान पैदा नहीं होता, लेकिन दृढ़तापूर्वक अभ्यास से हरेक व्यक्ति अपने में गुण पैदा कर सकता है।


बहुत से विचारक ऐसे हुए हैं जिन्हें बचपन में बहुत डर लगता था, परंतु अच्छे संगत विचारों से उनमें आत्मविश्वास जागा और वे ऐसे निडर बने कि दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं डरा सकी। मनुष्य का मन चंचल है इसलिए बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती। बिना बुद्धि स्थिर हुए आत्मविश्वास नहीं हो सकता। इसलिए सत्पुरुषों की संगत अति आवश्यक है। अस्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति सूखी पत्ती की तरह हवा में उडऩे वाला, सदैव दूसरों पर ही निर्भर रहता है। परंतु जिसकी अपनी मजबूती होती है वह अपने बल पर चलता है। आत्मविश्वास पर खड़ा किया गया भवन हमेशा सुरक्षित रहता है।
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नि:संदेह आत्मविश्वास अनेकों रोगों की दवा है, जहां व्यक्ति अनेक प्रकार की भूत-भविष्य की चिंताओं में घुटता रहता है। और परिश्रम से जी चुराता है, वहीं आत्मविश्वासी को किसी प्रकार की असफलता का मुंह नहीं देखना पड़ता। एक राजा पर किसी दुश्मन राजा ने चढ़ाई कर दी। राजा ने उसका मुकाबला किया। लेकिन हार गया। अपने प्राण बचाने के लिए जंगल में एक गुफा में शरण ली। जब राजा छिपकर बैठा था तो उसने देखा कि एक कीड़ा दीवार में चढ़ने की कोशिश करता है, परंतु गिर जाता है।

राजा उसी कीड़े के प्रयास को देखता रहा कई बार वह गिरा, परंतु कीड़े का प्रयास बराबर जारी रहा और अंत में उसे सफलता मिली। राजा सोचने गला कि इस छोटे से कीड़े ने हिम्मत नहीं हारी और आखिर दीवार पर चढऩे में उसे सफलता मिल ही गई। उससे राजा को प्रेरणा मिली, भीतर का विवेक जागा और उसने सोचा जब इस कीड़े को सफलता मिली तो मैं तो मानव हूं। कोशिश करूं तो अवश्य मेरी भी जीत होगी। वह गुफा से बाहर निकला। उसने बिखरी सेना को एकत्रित किया और सैनिकों में भी आत्मविश्वास जगाया तथा अपना खोया हुआ राज्य पुन: हासिल कर लिया।

बहुत से व्यक्ति आत्म-विश्वास को घमंड मानते हैं। यह सरासर गलत है। आत्मविश्वास गुण है- जो आदमी को धीरज प्रदान करता है। घमंड दुर्गुण है- वह आदमी को गिराता है। घमंड व्यक्ति का दुश्मन है, आत्मविश्वास सच्चा मित्र है।

अक्सर देखने में आता है, कि हम अपनी सफल का श्रेय स्वंम और अपने विफलता का श्रेय किसी दुसरो के सर मढने का प्रयास करते है। परन्तु अगर आप स्वंम को ध्यान से समझे तो आप को पता लगेगा की, हर एक अच्छे और बुरे, सफलता और विफलता के लिए हम स्वंम जिम्मेदार है। लेकिन हम इसे स्वीकार नही करते है और हम और बाहर की तरफ अपनी असफलता और और अपने दु:खो का कारण खोजते है। और आप अपने मन को तर्क देने में सफल हो गए की इस बाहरी वजह से हुआ है। तो क्या आप स्वंम को कही गुमराह तो नही कर रहे है? मै ऐसा इस लिए कह रहा हु, कि अधिकतर लोग अपने असफलता या दु:खो के लिए नसीब का दोष दे कर अपने आप को सुरक्षित महसूस करते है। अधिकतर लोग इसके लिए तंत्र मन्त्र या बहुत सारे अंधविश्वास के सहारे इसे सही करने का प्रायस करते है। इस समझने के लिए कुछ उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते है। अगर किसी व्यक्ति को केंसर हुआ है और वह बहुत पीड़ित है। तो क्या तंत्र मन्त्र से ठीक किया जा सकता है? क्या पूजा पाठ करने से ठीक हो जाएगा? नही, अगर ऐसा करता है तो वह अपने आप को मृत्व समीप ले जाने का प्रयास कर रहा है। हमारा शारीर भी एक तंत्र की भाति ही कार्य करता है अगर उसका सही तरह से ख्याल नही रखा जाएगा तो ये सब विकृतिया उत्पन्न हो सकती है। परन्तु इसके लिए हमे औषधि और अच्छे बैध की जरूरत होती है। योग और व्यायाम की जरूरत होती है।

दोस्तों इसी प्रकार जब हमे असफलता प्राप्त होती है, तो हम अपने तैयारी का दोष न दे कर अपने भाग्य और किस्मत को कोसते है। एक बहुत ही अच्छी बात लिखी गयी है कि “असफलता का मुख्य कारण सच्चे मन से प्रयास नही किया गया” इस लिए जब तक आप स्वंम को उस सफलता के काबिल नही बना लेते तब तक सफलता आप के हाथ नही आ सकती है। इस लिए सबसे जरुरी है की स्वंम को समझना और उस दिशा में प्रयास करना।

वर्तमान समय में अगर हमें कुछ पाना है, किसी भी क्षेत्र में कुछ करके दिखाना है, जीवन को खुशी से जीना है, तो इन सबके लिए आत्मविश्वास का होना परम आवश्यक है। आत्मविश्वास में वह शक्ति है जिसके माध्यम से हम कुछ भी कर सकते है।

''संसार के सारे युद्धों में इतने लोग नहीं हारते, जितने कि सिर्फ घबराहट से।' अतः अपने ऊपर विश्वास रखकर ही आप दुनिया में बड़े से बड़ा काम सहज ही कर सकते हैं और अपना जीवन सफल बना सकते हैं। मधुमक्खी कण-कण से ही शहद इकट्ठा करती है। उसे कहीं से इसका भंडार नहीं मिलता। उसके छत्ते में भरा शहद उसके आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम का ही परिणाम है।

दोस्तों अपने अंदर का विश्वास ही किसी व्यक्ति के लिए सफलता का मार्ग खोलता है। अगर आपके पास सारा संसधान, क्षमता, योग्यता आदि हो लेकिन उसके ऊपर आपका विश्वास नहीं हो, तो सफलता आपसे उतनी ही दूर है, जितनी दूर समुद्र के किनारे बैठे व्यक्ति से मीठा पानी।

हालांकि, हर तरह के अभावों के बावजूद अगर किसी व्यक्ति के अंदर अपने को साबित करने का विश्वास है, यानी वह आत्मविश्वास से लबरेज है, तो उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता। आत्मविश्वास एक ऐसा मंत्र है, जिसके आगे सारे संकट दूर हो जाते हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति वाले के सामने मुसीबतों का पहाड़ भी सपाट मैदान की तरह बन जाते हैं और जिनके पास इसकी कमी होती है वह छोटी-मोटी समस्याओं से भी इतने घबरा जाते हैं कि उससे बचने के उपाय ढूंढ़ते-ढूंढ़ते खुद ही अपने आस पास के लोगों के लिए मुसीबत बन जाते हैं। इतिहास गवाह है कि कई लोगों ने केवल अपने आंतरिक ताकत के बल पर ही साम्राज्य कायम किया, नहीं तो एक सामान्य से मुखिया के घर में पैदा हुआ चंद्रगुप्त मौर्य कभी सम्राट नहीं बनता।

दोस्तों वर्तमान समय में भी कई राजनीति से लेकर व्यवसाय तक कई उदाहरण पड़े हैं, जिसमें कई सामान्य लोगों ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। विश्व के अधिकांश महानतम व्यक्ति चाहे वो गांधी हों या फिर माक्र्स, सभी के जीवन की शुरुआत सधारण तरीके से हुई, कठिन परिस्थितियों से जूझते हुए उन्होंने अपने जीवन का सफर शुरू किया लेकिन आत्मविश्वास की दृढ़ता की वजह से ही कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए वैश्विक मानव की श्रेणी में पहुंचे।

कई मौकों पर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ा लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास को डिगने नहीं दिया और एक दिन सफलता की विजय गाथा लिखी। इसलिए कामयाबी के लिए आत्मविश्वास यानी अपने ऊपर विश्वास होना सबसे अहम है।
जीवन में सफल होना कौन नही चाहता, हम अपने अपने तरीके अपना कर जीवन में सफल होने का प्रयत्न करते रहते हैं।हर व्यक्ति की मूलभूत चाहत होती है कि उसके जीने के मायने हों। वह इतना सक्षम हो कि न केवल अपनी वरन अपने परिजनों-परिचितों की भी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति कर सके। समाज में उसका सम्माननीय स्थान हो। कोई व्यक्ति व्यवसाय करता है, कोई व्यक्ति नौकरी करता है तो कोई अन्य उद्योग करता है। जीवन में सफलता पाने के लिए एक लक्ष्य अपना कर उस का चिंतन -मनन करो ,उसे अपना जीवन बना लो अपनी सम्पूर्ण शक्ति को लगा दो अन्य विचार त्याग दो । दृढ़ता के साथ उसे पूरा करने की इक्षा करो । दृढ़ता में बड़ी ताकत होती है । प्रबल इक्षा शक्ति सफलता जरुर देगी ।जो लोग मंजिल पर नहीं पहुंच पाते, वे इसके लिए अपने भाग्य को कोसते हैं और इसे नियति मानकर बैठ जाते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम है कि जीवन में सफलता पाने के लिए अपने भीतर कुछ विशिष्ट गुण पैदा करने पड़ते हैं जिन्हें हम सफलता के सूत्र भी कह सकते हैं। यहां कुछ ऐसे ही सूत्रों की चर्चा कर रहे हैं जिन्हें आत्मसात् करके आप अपने कार्य क्षेत्र में सफल हो सकते हैं

 दोस्तों प्रत्येक व्यक्ति निरन्तर विकास और सफलताओं के ख्वाब संजोता है लेकिन जब ख्वाब टूटने लगते हैं तो वह निराश व तनाव को अपने ऊपर हावी कर लेता है। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि आज के प्रतिस्पर्धा वाले युग में कोई भी कार्य कठिन ज़रूर हो सकता है परन्तु असंभव नहीं। ज़रूरत है तो बस आत्मविश्वास की। ऐसी धारणा है कि मनुष्य की आधी क्षमता शरीर और कौशल के साथ जुड़ी होती है, और शेष क्षमता आत्मविश्वास के सहारे टिकी रहती है, परन्तु सभी इसका उपयोग नहीं कर पाते, जो करते हैं सफलता एक न एक दिन उनके कदम चूमती है। आत्मविश्वास से ही मनुष्य के भीतर की क्षमता जाग्रत होती है। कई लोगों में योग्यता व क्षमता तो होती है लेकिन आत्मविश्वास नहीं होता, इसलिए सफलता भी इनसे दूर रहती है। सफलता तभी मिलेगी जब आप अपनी क्षमताओं पर विश्वास करते हुए अटूट लगन व मेहनत से काम करें।

किसी भी कार्य की सफलता में जितना बड़ा योगदान हमारे अभ्यास और परिश्रम का होता है, उतना ही आत्मविश्वास का भी होता है। मनोवैज्ञानिक आत्मविश्वास को प्रेरणा का ही एक आयाम मानते हैं, जितनी अधिक प्रेरणा होगी, उतना ही अधिक आत्मविश्वास और सफलता की संभावना होगी। आत्मविश्वास बढ़ाने के कई तरीके हो सकते हैं। अपने अतीत की सफल घटनाओं को याद करने से आत्मविश्वास बढ़ता है। अपना कोई आदर्श भी बनाया जा सकता है। अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार रहते हुए लगातार परिश्रम से अपने आत्मविश्वास को जगाया जा सकता है। इसी के बल पर अपनी संकल्प शक्ति को भी मज़बूत किया जा सकता है। आत्मविश्वासी बनकर आप व्यक्तिगत सफलता तो पाएंगे ही, समाज में भी आप को सम्मान मिलेगा।

लक्ष्य प्राप्ति के लिए यह ज़रूरी है अदम्य इच्छाशक्ति का होना। इच्छाशक्ति ही मनुष्य को उसके लक्ष्य तक लेकर जाती है। चाहे रास्ता कितना ही लंबा क्यों न हो, चाहे कितना ही त्याग क्यों न करना पड़े, इच्छाशक्ति ऐसी ऊर्जा या ताकत है जो मनुष्य को उसके उद्देश्य तक अवश्य पहुंचाती है। जीवन में गंभीर चुनौतियां क्यों न हों, यदि व्यक्ति में चुनौतियों का सामना करने की इच्छाशक्ति है तो कुछ भी असंभव नहीं है। प्रबल इच्छाशक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति कार्य कुशल बन सकता है। इच्छाशक्ति सफलता की कुंजी है, इसलिए अपने भीतर इसे पैदा करें। इच्छाशक्ति के बल पर ही साहसी, परिश्रमी एवं धुन के पक्के लोग विश्व कीर्तिमान रचते हैं।

दोस्तों किसी भी क्षेत्र में सफलता का मूल रहस्य आत्मविश्वास है। आत्मविश्वास का मुख्य उद्देश्य है हृदय-क्षुद्रता का निराकरण। जिसके अंदर आत्मविश्वास होता है वह अनेक प्रतिकूलताओं के बावजूद संतुलित मनोमस्तिष्क से हर समस्या का समाधान सहज ही कर लेता है। अगर सारी साधन-सुविधाएँ उपलब्ध होने पर भी किसी में आत्मविश्वास का अभाव हो तो वह दीन हीन और किंकर्तव्यविमूढ़ (कर्तव्य का निर्णय करने में असमर्थ) हो जाता है। आत्मविश्वास की कमी असफलताओं की जननी है। अपनी शक्ति में विश्वास से ही शक्ति प्राप्त होती है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण में कहा गया हैः मानसं विद्धि मानवम्। मनुष्य मनोमय है। वह जैसा सोचता है, वैसा बन जाता है।

जो अपने को दीन-हीन समझता है वह दीन-हीन बन जाता है और इसके विपरीत जो अपने दिव्य स्वरूप, आत्मस्वरूप का ज्ञान पाता है, चिंतन करता है, उसके स्वभाव, संस्कार में दिव्यता भरती जाती है।

दोस्तों सफलता और असफलता में बहुत अंतर नहीं होता। जिस बिंदु पर असफलता की मृत्यु (समाप्ति) होती है, उसी बिंदु पर सफलता का जन्म (प्रारम्भ) हो जाता है

दोस्तों बहुत से छात्र साधारण योग्यता होते हुए भी आत्मविश्वास के धनी होने के कारण प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते जले जाते हैं और अनेक योग्य छात्र भी आत्मविश्वास के अभाव में यही सोचते रह जाते हैं कि ‘क्या हम सफल हो पायेंगे !’

आत्मविश्वास के अभाव से ही पूरे वर्ष कड़ी मेहनत करने पर भी जब परीक्षा की घड़ी आती है तो बहुत से छात्र हताश हो जाते हैं और जानते हुए भी जवाब नहीं दे पाते, फलतः असफल हो जाते हैं।

आत्मविश्वास कैसे जगायें ?

 “आत्मविश्वास यानी अपने आप पर विश्वास। आत्मविश्वास ही सभी सफलताओं की कुंजी है। इसकी कमी होना, स्वयं पुरुषार्थ न करके दूसरे के भरोसे अपना कार्य छोड़ना – यह अपने साथ अपनी आत्मिक शक्तियों का भी अनादर करना है। ऐसा व्यक्ति जीवन में असफल रहता है। जो अपने को दीन-हीन, अभागा न मानकर अजन्मा आत्मा, अमर चैतन्य मानता है, उसको दृढ़ विश्वास हो जाता है कि ईश्वर व ईश्वरीय शक्तियों का पुंज उसके साथ है।

आत्मविश्वास मनुष्य की बिखरी हुई शक्तियों को संगठित करके उसे दिशा प्रदान करता है। आत्मविश्वास से मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक शक्तियों का मात्र विकास ही नहीं होता बल्कि ये सम्पूर्ण शक्तियाँ उसके इशारे पर नाचती हैं।

दोस्तों आत्मविश्वास सुदृढ़ करने के लिए प्रतिदिन शुभ संकल्प व शुभ कर्म करने चाहिए तथा सदैव अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिए। जितनी ईमानदारी व लगन के साथ हम इस ओर अग्रसर होंगे, उतनी ही शीघ्रता से आत्मविश्वास बढ़ेगा। फिर कैसी भी विकट परिस्थिति आने पर हम डगमगायेंगे नहीं बल्कि धैर्यपूर्वक अपना मार्ग खोज लेंगे। फिर भी यदि कोई ऐसी परिस्थिति आ जाय जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर ले जाने की कोशिश करे तो परमात्म-चिंतन करके ‘ॐ’ का दीर्घ उच्चारण करते हुए हमें ईश्वर की शरण चले जाना चाहिए। इससे आत्मबल बढ़ेगा, खोया हुआ मनोबल फिर से जागृत होगा। 

अतः कैसी भी विषम परिस्थिति आये, घबरायें नहीं बल्कि आत्मविश्वास जगाकर आत्मबल, उद्यम, साहस, बुद्धि व धैर्यपूर्वक उसका सामना करें और अपने लक्ष्य को पाने का संकल्प दृढ़ रखें।

लक्ष्य न ओझल होने पाये, कदम मिलाकर चल।
सफलता तेरे कदम चूमेगी, आज नहीं तो कल।


सदा विजयी’ आत्मविश्वास का यह ध्येय वाक्य है। आत्मविश्वास विजय के रथ पर आरूढ़ होता है, पराजय इसके पास नहीं फटकती। यह तमस के सघन कुहासे में तेजस्वी सूर्य-सा चमकता है। कठिनाइयाँ, बाधाएँ, विपत्तियों के बीच पल-बढ़कर यह और भी उत्तप्त एवं प्रखर होता है। यह हर विपरीत परिस्थितियों को चीरकर निकल जाता है। प्रतिकूलता में अनुकूलता उसका मुख्य लक्ष्य होता है। आत्मविश्वास कभी हार नहीं मानता, कभी हारता नहीं, थकता नहीं, रुकता नहीं। सदैव अपने लक्ष्यपथ पर बढ़ता रहता है। वह अपने दुर्धर्ष पुरुषार्थ पर अपेक्षा रखता है औरों पर नहीं। वह केवल परमात्मा के विधान के सामने नतमस्तक होता है, कभी कमजोरियों पर नहीं।

आत्मशक्ति पर चट्टानी विश्वास :

आत्मविश्वासी का चट्टानी विश्वास अपनी आत्मशक्ति पर होता है। उसकी सपस्त आस्था इस महान सत्य पर घनीभूत होती है। शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि के इस परम ऋषिमंत्र का वह ध्याता होता है। भगवकृपा का सतत आभास होने के कारण वह सफलता के शिखर पर भी गर्वोन्नत नहीं होता है, शांत-स्थिर होता है तथा असफलता के घोर निराशा के क्षणों में भी गहरे अँधेरों से घिरता नहीं है, विचारों की लौ को प्रदीप्त किए रहता है। आत्मविश्वास से रीते-रिक्त व्यक्ति को सफलता, सम्मान, श्रेय एवं यश मिलते ही फूलकर कुप्पा हो जाता है तथा दूसरों को हेय, तुच्छ एवं क्षुद्र समझने लगता है। इसके ठीक विपरीत असफलताओं की चोट को सह नहीं पाता है और आत्महत्या जैसे जघन्य कार्य करने हेतु उतारू हो जाता है।

सफलता को ईश्वरीय अनुदान माने :

दोस्तों आत्मविश्वास सफलता का पर्याय और प्रतीक है। आत्मविश्वासी इस सफलता को अपने पुरुषार्थ से उपार्जित न मानकर दित्य ईश्वरीय अनुदान मानता है। सफलता के लिए किया गया उसका हर संघर्ष उसे एक नए अनुभव एवं एक नई विशेषता से भर देता है। इस संघर्ष के माध्यम से उसमें सद्गुणों का संवर्द्धन एवं विकास होता है, जबकि विफलताएँ उसे अपनी कमियों-खामियों को पहचानने में और उनके निराकरण करने में सहायक साबित होती हैं। आत्मविश्वासी प्राप्त सफलता को अपने ही उपयोग-उपभोग में इस्तेमाल नहीं करता वरन् उसे औरों में बाँटता एवं समृद्धि के द्वारा अगणित लोगों की सेवा-सहायता करता है। जिस किसी तरह से श्रेय-सफलता एवं यश-सम्मान हासिल करने की प्रवृत्ति उसमें नहीं होती।

आत्मविश्वास का विकास अपने ही विचारों और मान्यताओं के आधार पर होता है। हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही हम बन जाएँगे। कायरता या प्रखरता, राख या अंगारे का चयन हमें करना है। आत्मविश्वासी इन दोनों में से उच्चतम का वरण करता है और उस पथ पर बढ़ चलता है, जिसके पदचिह्न औरों के लिए पाथेय बनते हैं। वह प्रतिकूल परिस्थितियों को अनकल कर अपने चारों ओर स्वर्गीय एवं सुंदर वातावरण विनिर्मित कर लेता है, ठीक इसके विपरीत दुर्बल मन:स्थिति का व्यक्ति ख्याली पुलाव पकाता रहता है, कोरी कल्पनाओं के संजाल में फँसा पड़ा रहता है। उसमें दृढ़ निश्चय तो दूर, कार्य की उमंग ही नहीं होती है। आत्मविश्वासी की दृढ़ता कठिन-से-कठिनतम कार्य को सरल एवं आसान बना लेती है। ऐसे में उसका आधा कार्य तो कार्यारंभ से पूर्व ही पूर्ण हो जाता है।

लक्ष्य के प्रति दृढ़ विश्वास :

आत्मविश्वासी का व्यवहार भी आकर्षक एवं लुभावना होता है। आत्मविश्वास एक ऐसी संजीवनी है जो व्यक्तित्व के तीनों पहलुओं-चरित्र, चिंतन और व्यवहार को प्रभावित करता है। लक्ष्य के प्रति विश्वास की प्रगाढ़ता हमारी कल्पनाओं और विचार-तरंगों को उसी ओर उन्मुख कर देती है। आत्मविश्वासी लक्ष्य का चयन करता है, सततसर्वदा उसी का चिंतन करता रहता है, उसकी योजना के बारे में सोचता है तथा उसे क्रियान्वित करने का हर संभव प्रयास-पुरुषार्थ करता है। यह प्रक्रिया इतनी गहरी होती है कि चरित्र के रूप में अचेतन की गहराई में जमे हुए संस्कार एवं प्रवृत्तियाँ उसी के अनुरूप चलना प्रारंभ कर देती हैं।

संपूर्ण सफलता का रहस्य :

आत्मविश्वासी विचारों और भावनाओं के बीच सामंजस्य रखने में दक्ष और कुशल होता है। विचारों के क्षेत्र में तर्क की बनावट-बुनावट बड़ी ही सघन होती है और वह स्वयं को ही औरों के समान चुभती-टीसती रहती है, जबकि कोरी भावुकता एक उद्दाम उफान के समान होती है, जो – अपने प्रवाह में विचारों को तिनके की तरह बहा ले चलती है। एक तर्क का कँटीला रेगिस्तान है तो दूसरा भावुकता का धंसता दलदल। दोनों ही अधूरे-अपूर्ण हैं। आत्मविश्वासी की द्रष्टि दोनों को समान रूप से देखती है। उसका व्यवहार दोनों को समग्र रूप से व्यवहृत करता है। अत: वह कर्तव्य के क्षेत्र में अत्यंत दृढ़ होता है तो भावना के क्षेत्र में उतना ही शालीन एवं विनम्र। इस प्रकार इसमें दृढ़ता एवं सुकोमलता का अनोखा और अद्भुत संयोग होता है, जो संपूर्ण सफलता का रहस्य है, कुंजी है।

सफलता का यह सूत्र अपने मूल में बीज के समान छोटा होता है, परंतु इस बीज में विराट वृक्ष की अनंत संभावनाएँ एवं शक्ति-सामर्थ्य छिपी रहती है। आत्मविश्वासी इस बीज को उपयोगी पोषण देकर विशालकाय छायादार वृक्ष के रूप में विकसित कर देता है, जिसकी छाँव तले न जाने कितने थके-हारे पथिकों को शीतलता मिलती है, आगे बढ़ने से पूर्व थोड़ा विश्राम मिलता है। इस प्रकार वह स्वयं में तृप्त होता है और औरों को भी तृप्ति प्रदान करता है। आत्मविश्वासी का अंतर सजल भावनाओं से छलकता रहता है और अपने इर्दगिर्द प्रेमपूर्ण सौहार्द्र वातावरण बनाए रखता है। इस आंतरिक अनमोल शक्ति एवं सामर्थ्य को जान-परख लेने पर कोई भी सहज ही महानता के शिखरों पर पहुँच सकता है, कामयाबी की बुलंदियों को छू सकता

आत्मविश्वास बढ़ाने वाले विचार :

आत्मविश्वास विकसित करने के कुछ दिव्य सूत्र हैं, जिनका अनुपालन-अनुसरण कर कोई भी आत्मविश्वास रूपी संपदा को उपलब्ध कर सकता है।

1. दूसरों पर आश्रित रहने के बजाय स्वयं पर भरोसा करना चाहिए।

2. संदेह, शंका एवं संशय से सदा दूर रहना चाहिए, क्योंकि इनसे आत्मविश्वास घटता है।

3. स्वयंको हीन, दुर्बल एवं कमजोर तथा दूसरे को श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए। यह मनःस्थिति ईर्ष्या को जन्म देती है।

4. सफलता मिलने पर अहंता तथा असफलता से निराशा नहीं आनी चाहिए। असफलता के मूल कारणों का पता लगाते समय यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

5. दुर्गुण, कुटेव, बुरी आदतों से सदैव सतर्क-सावधान एवं सजग रहना चाहिए।

6. सदा शिष्ट, विनम्र एवं आदरयुक्त व्यवहार करना चाहिए।

7. नित्यप्रति नियमपूर्वक निर्धारित समय में स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था बनानी चाहिए।

इन सूत्रों में आत्मविश्वास बढ़ाने-विकसित करने की समस्त संभावनाएँ दबी-छिपी हुई हैं। इन्हें अपनाकर निर्विवाद रूप से हर कोई आत्मविश्वासरूपी अक्षय, अमूल्य विभूति से सराबोर हो सकता है।

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